सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

दशहरे की सुनहरी यादें : बचपन का एक संस्मरण

 सिमरी बख्तियारपुर,(सहरसा)।

सीताराम प्रसाद गुप्ता 
समय की धारा बहुत कुछ बहा ले जाती है, लेकिन कुछ स्मृतियाँ ऐसी होती हैं जो जीवनभर मन की गहराइयों में तैरती रहती हैं। आज भी जब दुर्गा पूजा के अवसर पर ढोल-नगाड़ों की थाप सुनाई देती है और हवा में अगरबत्ती की सुगंध घुलती है, तो मेरा मन बरबस पचास वर्ष पीछे लौट जाता है। बचपन का वह सुनहरा समय, जब दशहरा केवल पर्व नहीं बल्कि जीवन का उत्सव हुआ करता था।

पिता की दुकान और पूजा का माहौल: मेरे पिता जी की प्रसिद्ध दुकान उस समय इलाके की बड़ी दुकानों में गिनी जाती थी। दुकान का नाम मेरे दादाजी एवं पिताजी के नाम से अमृतलाल सुभूक लाल फार्म का नाम हुआ करता था। इस दुकान में थोक एवं खुदरा किराने की दुकान हुआ करती थी। दशहरा के पूर्व के दुकान का दृश्य अद्भुत होता। —अगरबत्तियों की खुशबू, नारियल, खाद्य सामग्री, तेल, डालडा की न बिक्री जोरों से होती थी। एवं ग्राहक की माँग पूरी करते। हम चारों भाई नन्हें-नन्हें कदमों से दुकान पर चक्कर लगाते रहते। एवं ग्राहकों की भीड़ एवं चहल-पहल को देख विस्मित हो जाते। यह सब हमारे लिए किसी जादुई दुनिया जैसा था।

बैलगाड़ी की सजावट: दशहरे का मुख्य आकर्षण बैलगाड़ी की सजावट हुआ करती थी। सबसे पहले पिछले वर्ष की सजावट को हटाया जाता—रस्सियाँ, कपड़े और टूटे-फूटे सामान अलग रख दिए जाते। फिर नया बाँस, सुतली, पत्तल और मोटा कपड़ा कलकत्ता से मँगाया जाता। उन्हें विभिन्न रंगों—लाल, हरे, पीले, नारंगी—में रंगकर धूप में सुखाया जाता। बैलगाड़ी के पहियों को अलकतरा से चमकाया जाता और उन पर रंग की नई परत चढ़ाई जाती। बैलों को नहलाकर उनके गले में घुँघरू बाँध दिए जाते। माथे पर चंदन का तिलक, शरीर पर रंग-बिरंगे गोल-गोल चिह्न और पैरों में छोटी-छोटी घंटियाँ—देखने वालों को लगता मानो ये साधारण बैल नहीं, बल्कि कोई राजसी शोभायात्रा के ध्वजवाहक हों।


दशहरे का दिन: दशहरे के दिन सुबह से ही उत्साह चरम पर होता। दोपहर तक स्नान करके सभी लोग नए वस्त्र पहन लेते। घर में विशेष भोजन बनता, सब मिलकर प्रसाद ग्रहण करते और फिर बैलगाड़ी यात्रा की तैयारी होती। बैलगाड़ी के आगे रंग-बिरंगे झंडे और पीछे बच्चे खिलखिलाते। कोई बलून लिए दौड़ता, कोई मिट्टी की सीटी बजाता, तो कोई लकड़ी के बने खिलौने लहराता। गाड़ी पर बैठे बुजुर्ग प्रसन्न मुद्रा में आशीर्वाद देते। यात्रा की दिशा कोई यूँ ही तय नहीं होती थी। पुजारी पंचांग देखकर शुभ दिशा का चयन करते। यह केवल गाड़ी की यात्रा नहीं, बल्कि एक धार्मिक अनुष्ठान होता, मानो पूरे गाँव की आत्मा उस गाड़ी के साथ चल रही हो।

नीलकंठ का दर्शन: यात्रा का सबसे पावन पड़ाव नीलकंठ पक्षी के दर्शन का होता था। बैलगाड़ियाँ वहाँ रुकतीं और सभी लोग हाथ जोड़कर प्रणाम करते। यह विश्वास गहरा था कि दशहरे पर नीलकंठ का दर्शन वर्ष भर की सुख-समृद्धि और मंगल का आशीर्वाद देता है। वहाँ पर कई परिवार मिलते, प्रसाद बाँटते और घण्टों बातचीत करते। बच्चों के लिए यह किसी बड़े उत्सव जैसा होता—सभी गाड़ियाँ कतार में खड़ी, रंग-बिरंगे बैल सजे-धजे और ढोल-नगाड़ों की गूँज वातावरण में तैरती रहती।

मेलों की रौनक: दशहरे के अवसर पर मेला लगना तो मानो अनिवार्य परंपरा थी। चकरी और झूले पर बच्चों की भीड़ उमड़ पड़ती। फटाफट घूमते पहियों से उठती आवाज़ हमें रोमांचित कर देती। गुब्बारे, बांसुरी, खिलौने और मिठाइयों की दुकानों की चहल-पहल हर किसी को आकर्षित करती। हम बच्चे कभी जलेबी खाते, कभी मिट्टी की सीटी बजाते और कभी खिलौने के लिए जिद करते। बड़े-बुजुर्ग दुकानदारों से मोलभाव करते और युवाओं की टोली दोस्तों के साथ आनंद में खो जाती।

पूजा-अर्चना और समापन: यात्रा का समापन माँ दुर्गा के मंदिर या हनुमानजी के दरबार में जाकर होता। वहाँ आरती होती, घंटों की गूँज उठती और दीपों की ज्योति वातावरण को आलोकित कर देती। कई परिवार गुरुद्वारे भी माथा टेकने जाते। धार्मिक आस्था और सामाजिक एकता का वह सम्मिलन किसी पर्व से बढ़कर अनुभव होता। 

स्मृति की धड़कन: आज जब दशहरा आता है, तो वह सब कुछ आँखों के सामने चलचित्र की तरह घूम जाता है। बैलगाड़ी की चर्र-चर्र, बैलों की टाप, गले की घंटियों की झंकार, रंग-बिरंगे कपड़ों की सजावट, मेले की चहल-पहल और परिवार की हँसी-खुशी। वह दशहरा केवल एक पर्व नहीं था, बल्कि गाँव की संस्कृति का उत्सव, परिवार की आत्मीयता का पर्व और बचपन की सबसे मधुर धड़कन था।  

लेखक: सीताराम प्रसाद गुप्ता 

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

95.2 प्रतिशत अंक लाकर सृष्टि केसरी ने बढ़ाया सिमरीबख्तियारपुर का मान

 सिमरीबख्तियारपुर, सहरसा। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) इंटरमीडिएट परीक्षा में नगर परिषद क्षेत्र की प्रतिभाशाली छात्रा सृष्टि केसरी ने 95.2 प्रतिशत अंक प्राप्त कर क्षेत्र का नाम रोशन कि या है। सृष्टि की इस शानदार सफलता से पूरे सिमरीबख्तियारपुर सहित आसपास के इलाके में खुशी का माहौल है। परीक्षा परिणाम घोषित होते ही परिवार एवं शुभचिंतकों में उत्साह की लहर दौड़ गई। बताया जाता है कि सृष्टि शुरू से ही पढ़ाई में मेधावी रही है तथा उसने लगातार मेहनत और अनुशासन के बल पर यह मुकाम हासिल किया है। उसकी इस सफलता पर स्वजन, रिश्तेदार एवं आसपास के लोग घर पहुंचकर बधाई दे रहे हैं। लोगों ने मिठाई खिलाकर अपनी खुशी जाहिर की। सृष्टि के पिता कंचन कुमार केसरी एवं माता मनीषा देवी ने बेटी की उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि कठिन परिश्रम, लगन एवं आत्मविश्वास के कारण सृष्टि ने यह सफलता हासिल की है। उन्होंने कहा कि बेटी की उपलब्धि पूरे परिवार के लिए गर्व का क्षण है। सृष्टि ने अपनी सफलता का श्रेय माता-पिता एवं शिक्षकों को देते हुए कहा कि नियमित अध्ययन, अनुशासन एवं शिक्षकों के मार्गदर्शन से य...

सिमरी बख्तियारपुर में स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार: संजीवनी आयुष होमियोपैथिक सेंटर का भव्य उद्घाटन

सिमरी बख्तियारपुर, (सहरसा)। सिमरी बख्तियारपुर नगर परिषद क्षेत्र में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की दिशा में शनिवार को एक नया अध्याय जुड़ा। नगर के हृदय स्थल पर इलेक्ट्रॉनिक्स आवास के बगल में "संजीवनी आयुष स्वास्थ्य केंद्र" का विधिवत उद्घाटन किया गया। यह नए केंद्र के उद्यम से स्थानीय इलाके में हर्ष का मोरक्को है, क्योंकि अब उन्हें कॉम्प्लेक्स बिल्डरों के इलाज के लिए दूर जाना नहीं है।  ​उद्घाटन समारोह एवं मुख्य अतिथि कार्यक्रम का उद्घाटन: सिमरी बख्तियारपुर नगर परिषद के उपसभापति प्रतिनिधि सह वार्ड वार्ड विकास कुमार मोरी, किले के नेता चंद्रमणि, भाजपा नेता संजीव कुमार भगत, चिकित्सक डॉ. प्रणव कुमार एवं डॉ. फीफीक्स के सामूहिक रूप से मनोज कुमार यादव और दीपक शेखावत का निधन हो गया। इस अवसर पर क्षेत्र के प्रमुख चिकित्सक, चिकित्सक नागरिक, राजनीतिक प्रतिनिधि और सामाजिक कार्यकर्ता बड़ी संख्या में उपस्थित रह रहे हैं। ओक्लाहोमा में आयोजित ऑर्केस्ट्रा के बाद मेडिकल क्षेत्र में होम्योपैथिक के बढ़ते प्रभाव पर चर्चा की गई। ​होम्योपैथी: सुरक्षित और आसान विकल्प: ​रोह को वर्तमान में दिखाते ह...

वट सावित्री व्रत श्रद्धा और उल्लास के साथ, सुहागिनों ने पति की दीर्घायु की कामना की

सिमरी बख्तियारपुर, बिहारटं सिमरी बख्तियारपुर नगर परिषद सहित ग्रामीण क्षेत्र में शनिवार को वट सावित्री व्रत श्रद्धा, आस्था और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। सुहागिन महिलाओं ने 16 श्रृंगार कर बरगद (वट) वृक्ष की पूजा की- साबूत की और पति की लंबी उम्र और उत्कृष्ट सौभाग्य की कामना की। धार्मिक मत के अनुसार इसी दिन देवी सोनिया ने यमराज से युद्ध कराकर अपने पति सत्यवान के प्राणों की रक्षा की थी। यह व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है। नगर परिषद क्षेत्र के हटिया गाछी, पुराना बाजार, रानी बाग, रंग बिरंगे क्षेत्र सहित ग्रामीण क्षेत्र में सुबह से ही पूजा-राहत का माहौल बना रहा। महिलाओं ने वट वृक्ष के नीचे दी कथा सात्विक और पारंपरिक-विधान से पूजा अर्चना की। अनोखा स्वर का प्रतीक वट वृक्ष माना जाता है: वट सावित्री व्रत में बरगद के पेड़ का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक सिद्धांतों के अनुसार वृक्षों में ब्रह्मा, तने में भगवान विष्णु और उद्योगों में भगवान शिव का वास माना जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि वट वृक्ष की पूजा से सौभाग्य, सुख-शांति एवं स्थायी धन की प्राप्ति होती है। इस ...